मासूम

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एक वार्तालाप सात साल के बच्चे और सत्रह साल की युवती के बीच

बच्चा : दीदी आप यहाँ कैसे आईं?

युवती : ये बहुत लंबी कहानी है , तुम्हारे समझ में नहीं आएगी

बच्चा : बताओ दीदी हो सकता है मुझे समझ में ही जाए , पापा मम्मी कहते हैं मैं बड़ा हो रहा हूँ

युवती हंसते हुए : अच्छा ऐसी बात है तो चलो बताती हूँ

बच्चा खुश होकर इधर उधर देखा और वहीं फर्श पे बैठ गया, युवती भी वहीं पास में बैठ गई

युवती : मैं वहाँ से शुरू करती हूँ जहाँ से मुझे याद है मुझे जब पहली बार जिंदगी का एहसास हुआ , बहुत अच्छा लगा कुछ दिख तो नहीं रहा था मगर एहसास कर सकती थी।

एक आवाज कानों में पड़ी , “सुनिए आप पापा बनने वाले हैंदुसरी आवाज सुनी, “क्या कह रही हो, तुमने आज सबसे बड़ी खुशी दी है मुझे चलो डॉक्टर को दिखा लेते हैं

 

फिर हम डाॅक्टर के यहाँ पहुँचे कुछ तरह तरह की रोशनी दिखाई दी। डॉक्टर ने बताया सब कुछ ठीक है और हम वापस गये माँ तुम दादी बनने वाली हो“, “क्या बात कर रहा है बेटा ये तो बहुत खुशी की बात है, डॉक्टर को दिखा ले एक बार।” ” हाँ माँ दिखा लिया, उन्होंने बताया सब ठीक है शुरूआती दिनों में थोड़ी देखभाल करनी होगी बस।” , “क्या बताया डाॅक्टर ने लड़का है या लड़की ?”
कैसी बात करती हो माँ, क्या फर्क पड़ता है लड़के और लड़की से ?”
हुँह

सब बातों के बाद सन्नाटा हो गया
थोड़ी देर बाद , “तुम माँ की बात का बुरा मत मानना , वो पुरानी सोच वाली हैं लेकिन दिल से बुरी नहीं हैं।

 

बहुत सा समय बीत गया कई बार डॉक्टर के यहाँ जाना होता फिर वही सवाल होता, “अब तो बहुत समय हो गया है अब तो डाॅक्टर बता सकती है कि लड़का है या लड़की?”
माँ डाॅक्टर नहीं बता सकती ये गैर कानूनी है
मुआ आग लगे ऐसे कानून को जो वंश भी चलने दे, लड़की हो गई तो कौन वंश को आगे बढ़ावेगा?”

अगर कानून इजाजत दे भी तब भी मैं नहीं जानना चाहुंगा
ऐसे ही समय बीत गया और मैं दुनिया में गई माँ, पापा बहुत खुश थे दादी नाराज और दादाजी मुहल्ले में मिठाई बांट आए।

बचपन अच्छा बीत रहा था कभी किसी की गोद कभी किसी की
बड़ी हुई स्कूल जाना शुरू किया, वहाँ भी सब प्यार करते हाँ तरीका अलग था बस वाले भइया गोद में लेकर उतारते, मैं कहती मैं पैदल चली जाऊंगी तब भी।

 

थोड़ी और बड़ी हुई तो समझने लगी कि भइया अच्छे नहीं हैं तो माँ को बोला, माँ ने पापा को बोला और पापा ने स्कूल में और मेरी बस से उन भइया को हटा दिया गया शायद स्कूल से ही निकाल दिया गया था

कई बार बहुत जगह सुनने को मिलता, “ये क्या कर पाएगी, लड़की है।?” मगर पापा और मम्मी हिम्मत देते तो हौसला हो जाता
इसी हौसले के बल पर बारहवीं में गणित लिया और इंजीनियरिंग की तैयारी भी शुरू कर दी
स्कूल के बाद कोचिंग , लौटते हुए अंधेरा हो जाता था।

एक दिन लौटते हुए वही बस वाले भइया मिल गये मुझे देखकर मुस्कुराए और बोले बड़ी होकर तो तुम और प्यारी हो गई हो इतना बोल कर मेरे पीछे दौड़े, मैं भागी और भागकर एक कार से टकरा गई उसके बाद जब आंख खुली तो यहाँ थी।
बच्चा दुखी हो गया और बोला : ये तो अच्छा नहीं हुआ आपकी तो कोई गलती भी नहीं थी।

 

युवती : हम्म , लेकिन तुम यहाँ कैसे पहुँचे ?
बच्चा : मुझे तो पता ही नहीं कि क्या हुआ मैं तो पार्क में खेल रहा था मेरी गेंद झाड़ियों में चली गई मैं गेंद ढूँढ रहा था तभी मेरे क्लास की गुड़िया झाड़ियों में से भागती हुई आई मैंने उससे पूछा क्या हुआ , वो रोती हुई पीछे इशारा करते हुए भाग गई और पीछे से पी टी वाले सर बाहर आए, मुझे इशारे से अपने पास बुलाया और गुस्से में बोले क्या बताया उसने, मैं डर के बोला कुछ नहीं मगर उन्होंने मेरी गर्दन पकड़ ली मैं चिल्लाने की कोशिश करने लगा तो पास से एक पत्थर उठा कर जोर जोर से मेरे सिर पर तब तक मारा जब तक मेरे शरीर में थोड़ी बहुत भी हरकत थी बस उसके बाद मैं आपके साथ था।

पीछे से आवाज आई : तुम दोनों की कोई गलती नहीं है मेरे बच्चों, गलती मुझसे हो गई मेरे बनाए इंसान में इंसानियत की कमी रह गई

– By Nitin Srivastava

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