माँ ने दिल कुछ बड़ा किया

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हर ग्रन्थ से जो पाक वो कहानी लिखी जाए ।
कोई माँ गर रोज़मज़ा की कुर्बानियाँ गिनाये ।।
*माँ ने दिल कुछ बड़ा किया*
परिवार में अपने सबसे बड़ी माँ ।
हर पल ज़िम्मेदार खड़ी माँ ।
हर इक नन्ही नादानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
पढ़ने को उत्सुक बड़ी माँ ।
तेज़ बहुत , होशियार बड़ी माँ ।
हाल की हर इक मजबूरी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
करुं नौकरी , ज़िद पे अड़ी माँ ।
जोड़े हाथ और पैर पड़ी माँ ।
किसी रिवायत बेमानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
हाथ पे अपने चाहे घड़ी माँ ।
इक दिन बाबा से बोल पड़ी माँ ।
हर ख्वाहिश की बलिदानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
तीन बेटियों को जो जनी माँ ।
जली कटी कितनी थी सुनी माँ ।
खुद को वार के हर रानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
हर बेटी शिक्षित करे माँ ।
मुस्तक़्बिल विकसित करे माँ ।
कर ताज सजा हर पेशानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
तीन बेटियाँ ब्याह चली माँ ।
खिलती देखे हर कली माँ ।
पैसों की खींचातानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
वक्त बहा जैसे पानी माँ ।
इक दिन हुई वो माँ नानी माँ ।
हर इक कोमल किलकारी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
बिमारी से लगे थकी माँ ।
चीनी कम , ना अचार चखे माँ ।
हर उस छोटी कुरबानी पर ,
माँ ने दिल कुछ बड़ा किया ।।
इक दिन यूं ही चली गई माँ ।
चढ़ जीवन की बली गई माँ ।
डॉक्टर बोला ,” दिल फटा था ,
हद से ज्यादा बड़ा हुआ था ” ।।
माँ ने दिल को बड़ा किया था ।
हद से ज़्यादा बड़ा किया था ।।
– By Vidya Krishna.

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